Wednesday, 28 August 2019

*अमृता देवी बलिदान दिवस-भारतीय मजदूर संघ 28 अगस्त पर्यावरण दिवस*

 *वीरांगना अमृता देवी*

*शीश दिया, पर वृक्ष नहीं*
★★★★★★★

                 *व्यक्ति के व्यक्तित्व की महानता एवं अमरता उसके व्यवहार एवं कर्तव्य पर निर्भर करती हैं । राजस्थान में पर्यावरण संरक्षण एवं मरूस्थल के 'कल्पतरू' खेजड़ी वृक्षों की रक्षार्थ अपने प्राणों की आहुति देने की विश्‍व इतिहास की अविस्मरणीय एवं अद्वितीय गौरवपूर्ण घटना भारत में "28 अगस्त सन् 1730" के दिन तत्कालीन मारवाड़ रियासत ( वर्तमान जोधपुर संभाग ) की राजधानी जोधपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूरी पर खेजड़ली ग्राम में घटित हुई थी ।*

               *भारतवासी नदी, तालाब, कुआ, पीपल, बरगद, आम, नीम, कैथा, बेल, आंवला, अर्जुन और अशोक के वृक्षों को पूजनीय और वन्दनीय मानते हैं तुलसी के पौधे को अपने घर के आंगन में प्रस्थापित कर नित्य दीप जलाकर पूजा करते हैं ।*

              *अच्छा होता की हम सभी पेड़ पौधों के साथ भावनात्मक रिश्ता बनाएं । पिता व पुत्र तथा अन्य रिश्तों की भांति उनकी देखभाल करें । आखिर पेड़ पौधे भी इस रिश्ते का मूल्य चुकाते हैं । वे हमें शिव शंकर की भांति स्वयं विष पिकर जहरीली वायु  से बचाते हैं और प्राण वायु देते हैं । वे धरती का कटाव रोकते हैं, भू-स्तर बढ़ाते हैं, बादलों को बुलाकर वर्षा कराते हैं ।*

             *पश्चिमी लोगों ने इस बात पर लेशमात्र भी विचार नहीं किया कि प्रकृति का शोषण नहीं दोहन करना चाहिए । शोषण मानव के लिए खतरा बन जाएगा । बढ़ते प्रदूषण और बिगडते पर्यावरण पर विचार करने के लिए संयुक्‍त राष्ट्र संघ ने 5 जून 1972 को स्टाकहोम में एक विश्‍व सम्मेलन का आयोजन किया । वर्ष 1979 से चिपको आंदोलन से जुड़ी उत्तराञ्चल की बाली देवी ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। उत्तराञ्चल में सुन्दरलाल बहुगुणा चिपको आंदोलन के जनक माने जाते हैं। उन्होंने पेड़ों से चिपक कर उनकी कटाई रुकवाई। यह बात ध्यान देने योग्य है कि वृक्षारोपण के साथ वृक्षों की कटाई रोकना भी आवश्यक है। बिना इसके वृक्षारोपण व्यर्थ ही सिद्ध होगा। दु:ख इस बात का है कि चिपको आंदोलन के जनक सुन्दरलाल बहुगुणा को सभी जानते हैं किन्तु जननी तो इतिहास के गर्भ में समा गई है। इतिहास पलटें तो एक बहुत बड़ी हृदय-विदारक घटना चिपको आन्दोलन की जननी अमृता देवी की मिलेगी।*

             *जोधपुर (राजस्थान) के राजस्व विभाग के अभिलेखों से पता चलता है कि एक बार जोधपुर रियासत के महाराजा को महल की मरम्मत हेतु लकड़ी की आवश्यकता पड़ी। उन्होंने अपने कारिन्दों को आदेश दिया कि वे जोधपुर से 25 किलोमीटर दूर खेजड़ली गांव में खेजड़ी के जंगल से पेड़ों की कटाई करके लकड़ी की व्यवस्था करें। महाराजा के हुक्म का पालन करने कि लिए कुछ सिपाही मजदूरों के साथ कुल्हाड़ी लेकर उस गांव में पहुंचे, जहां खेजड़ी का विशाल घना जंगल है। वहां पेड़ों की कटाई शुरू हुई ही थी कि गांव के लोग इकट्ठा हो गए और वृक्षों को काटने का विरोध किया। किन्तु उनका विरोध मात्र मौखिक विरोध था। किसी में साहस नहीं था कि आगे बढ़कर समूह का नेतृत्व करें। अमृता देवी, जो घर में चक्की पीस रही थी, को जब पेड़ों की कटाई की खबर मिली तो उसने पेड़ काटने वालों को ललकारा और कहा कि हम प्राण देकर वृक्षों की कटाई रुकवाएंगे। उसने आगे कहा कि "जो सिर साटे रुख रहे तो भी सस्तो जांण"। इतना कहकर वह पेड़ से चिपक गई। सिपाहियों ने राजाज्ञा उल्लंघन की दुहाई देते हुए उसका सर काट दिया। मां का अनुसरण करते हुए उसकी दो बेटियों ने भी पेड़ से चिपक कर अपना शीश कटवाया। अब क्या था, ग्रामीण लोग एक-एक पेड़ से चिपक गए। सिपाहियों के आदेश से मजदूरों ने पेड़ से चिपके लोगों को एक-एक करके काटना शुरू किया। अंतिम बलिदान मुकलावा ने अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ दिया। यह घटना 28 अगस्त, 1730 (भाद्रपद शुक्ल 10, सम्वत् 1787) की है। महाराजा जोधपुर को जब इस हृदय-विदारक घटना की जानकारी मिली तो वे घटनास्थल पर आए और जनता से क्षमा मांगते हुए पेड़ों की कटाई रोक दी। और घोषणा की कि अब भविष्य में इस क्षेत्र के जंगलों में कोई हरा पेड़ नहीं काटेगा। वह राजाज्ञा आज भी ज्यों की त्यों लागू है।*

            *पर्यावरण प्रदूषण रूपी जिस दानव से आज समूची मानव सभ्यता भयभीत है उसका आभास महान वीरांगना अमृता देवी को आज से 275 वर्ष पहले ही हो गया था। अमृता देवी एवं उनके गांव के साथियों का वृक्षों की रक्षा के लिए बलिदान देना पूरे विश्व के लिए प्रेरणा स्रोत एवं ज्योति पुञ्ज बन गया है। खेजड़ली गांव में उन अमर बलिदानियों का स्मारक बना है। बलिदान स्थल पर प्रतिवर्ष "वृक्ष शहीद मेला" लगता है। राजस्थान के अतिरिक्त गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब एवं उत्तर प्रदेश के हजारों श्रद्धालु यहां इकट्ठा होते हैं और अमर शहीदों को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। 1997 से राज्य सरकार द्वारा घोषित अमृता देवी पुरस्कार प्रतिवर्ष अधिक से अधिक वृक्षारोपण करने वालों को दिया जाता है। जयपुर स्थित विश्व वानकी उद्यान के निकट झालना क्षेत्र में वीरांगना अमृता देवी की स्मृति में राज्य सरकार द्वारा अमृता देवी उद्यान की स्थापना कर उनकी 275वीं पुण्य तिथि पर जन उपयोग के लिए अर्पित किया गया है। 35 हेक्टेयर में फैले इस वृक्ष उद्यान में दुर्लभ प्रजाति के पेड़-पौधे भू-क्षरण को रोकते हैं। अमृता देवी बलिदान दिवस 28 अगस्त को भारत में पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। इस दिन अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना ही अमर बलिदानी वीरांगना अमृता देवी सहित 363 शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धाजलि*
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*भारतीय मजदूर संघ (पर्यावरण मंच)*

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